सदगुण और दुर्गुण क्या है । what is good habit and bad habit

सदगुण और दुर्गुण
सदगुण को चरित्र की सर्वउत्कृष्ट कहा जाता हैं। जिससे व्यक्ति नैतिक दृष्टि से प्रसनीय ढंग से काम करता है । ऐसा व्यक्ति जिसमें दयालुता का गुण होगा , वह दूसरे के प्रति दयालुता का काम करेगा । वह दयालुता  का व्यवहार मुख्यतः इसलिए नही करेगा कि इसके विचार से ऐसा करना उसका कर्तव्य हैं या हिसाब लगाता हैं कि दयालुता व्यवहार से समाज की कुल उपयोगिता अधिकतम हो जायेगी । वह दयालुता का व्यवहार इसलिए करता है कि उसमें दयालुता का सदगुण होते है । तथा उसका नैतिक चरित्र होता है ।
दुर्गुण = सदगुण के विपरीत होता है । यह  चरित्र की संसर्गत कमजोरी के केे कारण व्यक्ति        ऐसे कार्य करता है ।   सदगुणि सिद्धन , नैतिक सदगुुुणो     तथा गेर नेतिक सदगुणों में   दयालुता , परोपकार , करूणा , ईमानदारी , कर्तव्यंनिष्ठ्ठा्      तथा कृतज्ञता शााामिल    हैं । गेर नेेतिक सदगुुुणो के बीच अन्तर करता है । नेेतिक सदगुुुणो में आत्म  नियंत्रण , धैर्य ,  साहस , सहनसिलता  , अद्वव्ययवसाय तथा   ऐसे ही गुण होते हैं । उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति   बैंक के  लिए  बड़ा साहस  दिखा सकता हैं ।  नेतिक सदगुण , नेेेतिक   जीीवन बढ़ाते हैं ।
अरस्तू के नीति शास्त्र के मुख्य तत्व
● मनुष्य का लक्ष्य आत्म प्रसाद  करना होना चाहिये जिसे आनद या फलन फूलना भी कह सकते है ।
● सामाजिक जीव होने के कारण  मानव समुदायों में रहकर इस उद्देश्य की प्राप्ति कर सकता हैं ।
● एक विचारसिल प्राणि होने के कारण मानव को तर्कसंगत जीवन जीना होता है ।
● सदगुण  दो चरम के बीच की सुनहरी मध्य तथा इसे व्यवहारिक बुद्धि से हासिल किया जा सकता है ।
● ऐसे जीवन के लिए नैतिक सदगुण तथा बौद्धिक सदगुण का रोपण होना आवश्यक है ।
अरस्तु का तर्क है कि सद्गुणी व्यक्ति बनकर नैतिक चरित्र विकसित करना , नेतिक सिद्धान्तों के ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है। अरस्तु इस बात को मानता हैं कि  कार्यों का निर्देशन करने में नियमों तथा सिद्धान्तों की भूमिका होतीं है ।

  • तथापि सद्गुणी व्यक्ति नियमों का पालन स्वेक्षा और बिना प्रयास किए करेगा । मात्र नेतिक सिद्धान्तों का ज्ञान और बौद्धिक रूप से उन्हें स्वीकार करना किसी व्यक्ति को नेतिक बनाने के लिए पर्याप्त नही है।


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